Sunday, March 29, 2009

एक ख़्याल


"सबकी तहज़ीब कहाँ एक सी होती है,
कभी क्या ज़ुस्तज़ु भी रकीब होती है,"

"गर खुदा रोक दे बारिशें तो बता दूं सबको,
सूरज के साथ नही परछाईयाँ होती हैं,"

"उन अनकहे लम्हों को अब करीब नही रखता,
जानता हूँ नही उम्र भर ये रानाईयाँ होती हैं,"

"कुछ और थी बात उनकी जिन्हें मैं कहता था गुलमोहर,
कोन जाने क्या अब भी उनके साथ वही तनहाईयाँ होती हैं."

"की थी एक दुआ की जो चाहे वो मिले उनको,
मेरी सदाओं मे नही मेरी ज़िंदगी की तरह वीरानियाँ होती हैं."

गुलजार के नाम


पिछले कुछ सालो मे ज़िंदगी इतनी व्यस्त हो गई की मुझे खुद के लिए भी समय नही मिल पाया और शायर पीयूष कहाँ लापता हुआ कोई नही जनता. पर अब में एक नई शुरुआत कर रहा हू इस ब्लॉग के साथ. ये ब्लॉग गुलज़ार के नाम है जो मेरे पसंदीदा शायर है. गुलज़ार सबसे अलग है, उन्होने ही उर्दू मे छायावाद का प्रयोग किया है, मौसम मैं रानाईयाँ और खुश्बुओ को देखना उन्ही के बस की बात है. संपूर्ण सिंघ याने की गुलज़ार मूलत पंजाबी है पर उनकी शायरी लाज़वाब है. "आदतन तुमने कर दिए वादे, आदतन हमने एतबार किया," "तेरी राहों में बरहा रुक कर, हमने अपना ही इंतज़ार किया."